Home / Blog / Mokshada Ekadashi 2022 and its Advantage : मोक्षदा एकादशी व्रत आपके साथ पित्रों का भी करता है उद्धार। जाने क्या है मोक्षदा एकादशी व्रत के कथा का रहस्य। कैसे रखें एकादशी व्रत ?

Mokshada Ekadashi 2022 and its Advantage : मोक्षदा एकादशी व्रत आपके साथ पित्रों का भी करता है उद्धार। जाने क्या है मोक्षदा एकादशी व्रत के कथा का रहस्य। कैसे रखें एकादशी व्रत ?

हिन्दू पंचांग के अनुसार ( Mokshada Ekadashi)  एकादशी का व्रत 05 दिसंबर 2022 को बताया गया है। यह अपने आप में सभी पापों को नष्ट कर देता है और मोक्ष , सम्पन्नता और वैभव देता है। हिंदू कैलेंडर में, यह एकादशी एक पवित्र दिन है जो मार्गशीर्ष के महीने में शुक्ल पक्ष के 11 दिन पड़ता है।

Deepak Jain Deepak Jain Nov 23, 2022

Mokshada Ekadashi : कब मनाते है मोक्षदा एकादशी ? क्या हैं इसके अन्य नाम?

हिन्दू पंचांग के अनुसार ( Mokshada Ekadashi)  एकादशी का व्रत 05 दिसंबर 2022 को बताया गया है। यह अपने आप में सभी पापों को नष्ट कर देता है और मोक्ष , सम्पन्नता और वैभव देता है। हिंदू कैलेंडर में, यह एकादशी एक पवित्र दिन है जो मार्गशीर्ष के महीने में शुक्ल पक्ष के 11 दिन पड़ता है।

Mokshada Ekadashi

  • इस शुभ दिन पर, कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में, भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद भगवद गीता का ज्ञान प्रदान किया और इसलिए इसे गीता एकादशी भी कहा ( Mokshada Ekadashi) जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन किसी को भगवद गीता उपहार में देने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।
  • मोक्षदा एकादशी को वैकुंठ एकादशी ( Mokshada Ekadashi) भी कहा जाता है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु का निवास, वैकुंठ हर उस व्यक्ति को अनुमति देने के लिए खुला है जो इस एकादशी पर भगवान विष्णु का पालन और पूजा करता है।

Mokshada Ekadashi : पद्म पुराण के अनुसार क्या है मोक्षदा एकादशी की कथा ?

एक बार भगवान् श्री कृष्ण और कुंती पुत्र धर्मराज युधिष्ठिर साथ बैठे हुए थे उसी समय एकदशी की चर्चा हो रही थी।

युधिष्ठिर बोले- देवदेवेश्वर! मैं पूछता हूँ-मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी ( Mokshada Ekadashi) होती है, उसका क्या नाम है ? कौन-सी विधि है तथा उसमें किस देवताका पूजन किया जाता है ? स्वामिन्! यह सब यथार्थरूपसे बताइये ।

Mokshada Ekadashi

श्रीकृष्णने कहा— नृपश्रेष्ठ! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षकी एकादशीका ( Mokshada Ekadashi) वर्णन करूँगा, जिसके श्रवणमात्रसे वाजपेय यज्ञका फल मिलता है।

उसका नाम है— ‘मोक्षा’ एकादशी, ( Mokshada Ekadashi) जो सब पापोंका अपहरण करनेवाली है। राजन्! उस दिन यत्नपूर्वक तुलसीकी मञ्जरी तथा धूप-दीपादिसे भगवान् दामोदरका पूजन करना चाहिये। पूर्वोक्त विधिसे ही दशमी और एकादशीके नियमका पालन करना उचित है।

‘मोक्षा’ एकादशी ( Mokshada Ekadashi) बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है। उस दिन रात्रिमें मेरी प्रसन्नताके लिये नृत्य, गीत और स्तुतिके द्वारा जागरण करना चाहिये। जिसके पितर पापवश नीच योनिमें पड़े हों, वे इसका पुण्य-दान करनेसे मोक्षको प्राप्त होते हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

Mokshada Ekadashi : श्री कृष्ण ने सुनाई धर्मराज को मोक्षदा एकादशी व्रत कथा ?

पूर्वकालकी बात है, वैष्णवोंसे विभूषित परम रमणीय चम्पक नगरमें वैखानस नामक राजा रहते थे। वे अपनी प्रजाका पुत्रकी भाँति पालन करते थे। इस प्रकार राज्य करते हुए राजाने एक दिन रातको स्वप्नमें अपने पितरोंको नीच योनिमें पड़ा हुआ देखा।

उन सबको इस अवस्थामें देखकर राजाके मनमें बड़ा विस्मय हुआ और प्रातःकाल ब्राह्मणोंसे उन्होंने उस स्वप्नका सारा हाल कह सुनाया।

राजा बोले- ब्राह्मणो! मैंने अपने पितरोंको नरकमें गिरा देखा है। वे बारम्बार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि ‘तुम हमारे तनुज हो, इसलिये इस नरक-समुद्रसे हमलोगोंका उद्धार करो।’ द्विजवरो! इस रूपमें मुझे पितरोंके दर्शन हुए हैं। इससे मुझे चैन नहीं मिलता।

क्या करूँ, कहाँ जाऊँ ? मेरा हृदय रुँधा जा रहा है। द्विजोत्तमो ! वह व्रत, वह तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरकसे छुटकारा पा जायँ, बतानेकी कृपा करें।

मुझ बलवान् एवं साहसी पुत्रके जीते-जी मेरे माता-पिता घोर नरकमें पड़े हुए हैं! अतः ऐसे पुत्रसे क्या लाभ है।

Mokshada Ekadashi

ब्राह्मण बोले- राजन्! यहाँसे निकट ही पर्वत मुनिका महान् आश्रम है। वे भूत और भविष्यके भी ज्ञाता हैं। नृपश्रेष्ठ! आप उन्हींके पास चले जाइये।

ब्राह्मणोंकी बात सुनकर महाराज वैखानस शीघ्र ही पर्वत मुनिके आश्रमपर गये और वहाँ उन मुनिश्रेष्ठको देखकर उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके मुनिके चरणोंका स्पर्श किया। मुनिने भी राजासे राज्यके सातों * अङ्गोंकी कुशल पूछी।

राजा बोले- स्वामिन्! आपकी कृपासे मेरे राज्यके सातों अङ्ग सकुशल हैं । किन्तु मैंने स्वप्नमें देखा है कि मेरे पितर नरकमें पड़े हैं; अतः बताइये किस पुण्यके प्रभावसे उनका वहाँसे छुटकारा होगा ?

राजाकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्त्ततक ध्यानस्थ रहे। इसके बाद वे राजासे बोले – ‘महाराज ! मार्गशीर्षमासके शुक्लपक्षमें जो ‘मोक्षा’ नामकी एकादशी होती है, तुम सब लोग उसका व्रत करो और उसका पुण्य पितरोंको दे डालो। उस पुण्यके प्रभावसे उनका नरकसे उद्धार हो जायगा ।

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं- युधिष्ठिर! मुनिकी यह बात सुनकर राजा पुनः अपने घर लौट आये। जब उत्तम मार्गशीर्षमास आया, तब राजा वैखानसने मुनिके कथनानुसार ‘मोक्षा’ एकादशीका व्रत ( Mokshada Ekadashi) करके उसका पुण्य समस्त पितरोंसहित पिताको दे दिया।

पुण्य देते ही क्षणभरमें आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। वैखानसके पिता पितरोंसहित नरकसे छुटकारा पा गये और आकाशमें आकर राजाके प्रति यह पवित्र वचन बोले- ‘बेटा! तुम्हारा कल्याण हो।यह कहकर वे स्वर्गमें चले गये।

राजन्! जो इस प्रकार कल्याणमयी ‘मोक्षा’ एकादशीका व्रत करता है,

  • उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मरनेके बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
  • यह मोक्ष देनेवाली ‘मोक्षा’ एकादशी ( Mokshada Ekadashi) मनुष्योंके लिये चिन्तामणिके समान समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है।
  • इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे वाजपेय- यज्ञका फल मिलता है।

Mokshada Ekadashi

Mokshada Ekadashi : मोक्षदा एकादशी शास्त्रीय पूजन एवं व्रत विधि।

  • व्रत करने के दो तरीके हैं: निराहार और फलाहार, यानी आप बिना कुछ खाए उपवास कर सकते हैं या व्रत में बताए गए फल या उपयुक्त खाद्य पदार्थ अपने सामर्थ्य के अनुसार ग्रहण कर सकते हैं।
  • द्वादशी के दिन व्रत करने के बाद एकादशी पारण विधि का समापन होता है।
  • मान्यता है कि द्वादशी तिथि को किसी ब्राह्मण को भोजन कराने या गरीबों की मदद करने से सुमेरु पर्वत के संबंध में अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • इस दिन खाए जाने वाले सबसे लोकप्रिय खाद्य पदार्थों में ताजे फल, सूखे मेवे, सब्जियां, मेवे और डेयरी उत्पाद शामिल हैं।
  • लेकिन ध्यान रहे कि सभी पदार्थ सात्विक हों, जैसे बैंगन, मूली, लहसुन और प्याज वर्जित है, सब्जियों में तैयार नमक लेना भी वर्जित है।
  • एकादशी ( Mokshada Ekadashi) के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्वयं को स्वच्छ कर स्नान आदि करने के बाद भगवान विष्णु का मन्त्र लगाकर ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें।

Mokshada Ekadashi

  • पूजा के लिए चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद चारों तरफ गंगाजल छिड़कें।
  • पूजा के लिए कलश स्थापित करें और देसी घी का दीपक जलाएं और फूल चढ़ाएं। भगवान विष्णु को तुलसी का पत्ता जरूर चढ़ाएं।
  • धूप और दीप से भगवान की आरती करें और फिर विष्णु सहस्रनाम और कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।
  • भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी को दूध से बना भोग लगाएं और शाम को दोबारा पूजा करें।
  • भगवान की पूजा करने के बाद तुलसी पूजन और दान करें। फिर दूसरे दिन व्रत खोलें।
  • एकादशी के दिन सेम और अनाज खाना वर्जित है।
  • इस दिन भक्त के लिए किसी भी जानवर की हत्या वर्जित होती है।
  • व्रत करने वाले भक्त को किसी भी धोखेबाज, धोखेबाज या किसी नापाक गतिविधि में शामिल लोगों से मिलना या बातचीत नहीं करनी चाहिए।
  • शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि यदि कोई भक्त ऐसे व्यक्ति के सान्निध्य में आए तो उसे सूर्य के नीचे खड़े होकर उसे सीधे देखना चाहिए और पवित्र हो जाना चाहिए।
  • एकादशी ( Mokshada Ekadashi) और द्वादशी को संभोग से परहेज करें।

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